आजकल हम अपने दिमाग को rewire करने की बहुत बात करते हैं। हम अपनी पुरानी सोच को बदलना चाहते हैं, चीज़ों को नए नज़रिए से देखना चाहते हैं और उन patterns को तोड़ना चाहते हैं जिनमें हम सालों से सोचते आए हैं। लेकिन अगर सचमुच सोच बदलनी है, तो शुरुआत कभी-कभी किसी बड़े principle से नहीं, एक शब्द से भी हो सकती है। ख़ासकर भारत में।
Example के लिए… भारत में कारोबार कोई नई चीज़ नहीं है। हमारे यहाँ पीढ़ियों से लोग दुकान चलाते आए हैं, माल ख़रीदते और बेचते आए हैं, customers को समझते आए हैं, उधार देते आए हैं, margins निकालते आए हैं और एक दुकान को दो, दो को पाँच और पाँच को पचास बनाने के रास्ते खोजते आए हैं। उन्होंने इन सबके लिए कोई elaborate business vocabulary इस्तेमाल नहीं की। वे बस कहते थे, “धंधा है।”
फिर हमारी भाषा बदल गई। दुकान business बन गई, कारोबार enterprise बन गया और नया कारोबार startup बन गया… यह बदलाव ग़लत नहीं है। लेकिन शायद इसके साथ हमारा focus भी थोड़ा बदल गया। “Startup” सुनते ही हम abstract idea, funding, technology, users और growth की तरफ़ देखने लगते हैं। लेकिन “धंधा” सुनते ही भारतीय दिमाग शायद उन सवालों की तरफ़ लौटता है जिन्हें हमारा बाज़ार सदियों से पूछता आया है।
ग्राहक कौन है? वह वापस क्यों आएगा? पैसा कहाँ बनेगा? Margin कितना है? ख़र्च कितना है? मालिक के बिना काम चलेगा? और जो एक जगह चल रहा है, क्या वही दूसरी जगह भी चल सकता है?
यही इस एक शब्द की ताक़त है। और यह aspiring entrepreneurs के लिए बहुत important है। क्योंकि भारत में आज startup शुरू करना पहले से कहीं अधिक normal हो गया है, तो चुनौती अब केवल शुरुआत की नहीं है, बल्कि चुनौती यह समझने की है कि किसी idea को टिकाऊ business कैसे बनाया जाए और फिर उसे scale कैसे किया जाए।
बस सोचने का और जवाब देने का तरीक़ा बदलना है।
“आप क्या करते हैं?” “मैं धंधा करता हूँ।” |